राही September 21, 2006
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कितनी विचित्र बात है, प्यार का रिश्ता जिसकी कोई परिभाषा नहीं, न जाने कैसे जुड़ जाता है. अपने आप.
इस रिश्ते की उम्र कितनी होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है की आप के लिये उसकी अहमियत कितनी है.
जिन्दगी के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हुये ऐसे ही कई रिश्ते बनते जाते हैं. अकसर ऐसा होता है कि आप समय के साथ चलते जाते हैं, और रिश्ते धूल की गर्त में छिपते जाते हैं.
पर कई बार, न चाहते हुए भी आपको उन निगाहों से दूर जाना पड़ता है.
और कई बार, अचानक एक मोड़ पर, वही मासुम चेहरा आपके सामने होता है…
इक पल मे भुल चले, साथ गुजारे दिन
बातों की ही बातें, हँसते हुए पल छिन..
दूर जाने का दुःख, पास आने का डर
सारे जहाँ का प्यार, आँखो में ही भर..
दे दिया तुम्हें, चाहत की आस में
आ गयी इतनी पास, जाने किस विश्वास मे..
चल दिये तुम लेकिन, सारे बंधन तोड़कर ..
हाथ हिलाने वाले, देखा तक न मुँह मोड़कर.
मुझे मालुम है की इन सवालों का कोई जवाब नहीं, पर फिर भी मासुम प्रश्न का उत्तर उसी मासुमियत से देने कि कोशिश….
जीवन पथ में सुख, दुःख तो हमेशा आना है
लेकिन राही जानता है, उसको तो चलते जाना है..
छोटी-छोटी इन खुशियों को, झोली में सँभालकर
हँसते हुए मीठे सपनों को, आँखों में पालकर..
मंजिल की खोज में, आगे मै बढ़ चला
साथ में ले उसको, राह में जो मिला…
मुड़कर नहिं देखा, इस डर में खोता हुआ
रोक न ले मुझको, चेहरा कोई रोता हुआ..
17-8-94
मेरी कविता September 20, 2006
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बेतरतीब विचारों का
बेतरतीब जमाव.
भटकी नदी का
उत्श्रृँख बहाव..
प्रचण्ड वेग में
उफनती सविता…
ऐसी ही कुछ
मेरी कविता….
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अधकचरे शब्द
यहाँ वहाँ के.
अनदेखे वाक्य
जहाँ तहाँ के..
अनसमझे भावों की
एक संहिता…
ऐसी ही कुछ
मेरी कविता….
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कहीं क्लिष्ट वर्णों
का जमघट.
फिर सरल शब्दों
की आहट..
मूढ़ के लिए
जैसे गीता..
ऐसी ही कुछ
मेरी कविता….
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ये है विचारों
की ऊँचाई.
या नैतिक पतन
की गहराई..
सुरा पात्र में
जल गंगा-जी का..
ऐसी ही कुछ
मेरी कविता….
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7-11-94