आगमन
अब इसे आगमन कहे या प्रवेश…….पिछले अनेक सालो से आंग्ल भाषा मे लिखते और पढते अपने कम्पयुटर स्क्रीन पर कि-बोर्ड दबाने से हिन्दी के शब्दो को देखकर ऐसी अनुभूति हुयी मानो रेगिस्तान मे मेघों ने जैसे बरसना शुरू कर दिया हो और वो पानी कि बुंदे मात्र बुंदे नहि बल्कि पदचाप हों, उस पथ कि ओर से जहाँ से मैने चलना शुरु किया था..
अपनी पुरानी रचनाओं को फिर से पढने की इच्छा जागृत हुइ और घर से दूर, समान विचार वालो की जमात मे फिर से प्रस्तुत करने कि चाहत भी.
मेरी पहली पहल रचना….जिसे अपनी डायरी मे मैने ‘प्रारम्भिक नाम दिया था. यह तब की बात है जब मैं हाई स्कूल में था.
उपरोक्त रचना ने मेरी डायरी के प्रथम पृष्ठ पर अपना स्थान बनाया था. जब कुछ समय बाद मैने कुछ और रचनाये की और लोगो से वाहवाहि बटोरी, तब जो मन मे विचार आये, उनमे से एक को इसी प्रथम पृष्ठ के कोने मे जाना ही था -
मनःदशा
पंत, गुप्त, निराला को पीछे
छोड आगे बढ जाऊँ
रचनाये करु सुन्दर
खुब नाम कमाउँ
इसी तरह की मेरी कुछ कहीं अनकहि बातों को मैं इन पृष्ठों मे समेटने की कोशिश करुंगा.
हज़ारों मील की यात्राओं का भी एक आरंभ होता है,
एक कदम मात्र से ये सिलसिला प्रारंभ होता है,
हर पथिक चलता है, उत्साह लिये,
विजित वही जिसका धैर्य अनंत होता है.
बस लिखने और सृजनात्मकता का संग निरंतर रहे तो आपकी काव्ययात्रा प्रसिद्धी के असीम सोपान स्व्यं ही छू लेगी.
शुभकामनाएं
-श्रीमती रेणू आहूजा.