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तुम आयी थी मेरे द्वार September 13, 2006

Posted by राही in मेरी कवितायें.
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मैने देखा था जिन्दगी
तुम आयी थी मेरे द्वार
दामन भर लुटाती प्यार..

 मै रहा भ्रम मे सदा सुप्त.
 अठखेलियाँ तुम्हारी उनमुक्त.
 बिखरा रही प्राची बयार..
 मैने देखा था जिन्दगी
 तुम आयी थी मेरे द्वार..

क्या था वो हमारा मिलन,
या समय की भूल भुलैया ?
तुफानों मे खोजा तुमको,
मेरी प्यारी छोटी नैया !
पलो छेड़ सागर तार..
           मैने देखा था जिन्दगी
           तुम आयी थी मेरे द्वार..

अल्हड़ मादक यौवन रस,
भुला दिया क्षणिक स्पर्श !
निकल चली समय रेत सी,
चिल्लाता रहा मै हर्ष हर्ष !
क्या तुम ही हो उस पार..
          मैने देखा था जिन्दगी
          तुम आयी थी मेरे द्वार..

फेरो फिर स्नेह हाथ,
कब हुआ हमारा चिर साथ?
मैने पाया है दूर दूर,
ली न आलिंगन भरपुर !
ले के मेरी सारी हार..
        मैने देखा था जिन्दगी
        तुम आयी थी मेरे द्वार..

सहारे की बाहु पास,
या नियति का क्रुर हास?
क्या समझुँ मैं संगिनी,
ममता तुम्हारी या उपहास?
तुमको ही चाहा हर बार..
           मैने देखा था जिन्दगी
           तुम आयी थी मेरे द्वार !!

Comments»

1. Manish - October 5, 2006

aapka lekhan bahut achcha hai rahi ji !