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रहे सुखी सारा संसार September 12, 2006

Posted by राही in मेरी कवितायें.
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खग वृन्द का सुरमई गान

कलियों पर करते भौंरे रसपान !

खिल खिल हर कली मुस्काति

पिय पवन को मान दिखाती !

हर बेल हो गयी उत्श्रृंखल

 तरु शिखर को बढती पल पल !

शुभ संदेश की चली बयार

पलाश भुल गय अपनी हार  !

पतझड़ से उतरा हरित वसन

 छाया बसंत ने लाल बदन

 मन उड़ा खुशी के नील गगन मे

लगा प्रेम है मानों कण कण में

 यही तो मानव करता संधान

 सृष्टि को प्रेम पूरक मान

 भेदभाव से हो अनजान

न हो कभी प्रेम अम्लान

हर मानव को भाई समान

 रखना सदा हे भगवान

देना प्रेम कि इतनी किरणे

 हटे दुराशा का तम क्षण मे

 हो ताकत इतनी हर प्रण मे

 जीत सके जो हर इक पण मे

 तेरी तो सत्ता अनंत

  रखता सारा जब जीवंत

तु अचर अगाध अविनाशी

 कभी अमावस, कभी पूरनमाषी

  

 रखना सदा दया की द्रिष्टी

 ना करना कभी कोप कि वृष्टि

 तु अज्ञात फिर भी नतमस्तक

 जड़, चेतन सब जीव जगत

  

विनती करुँ यही हर बार

 रहे सुखी सारा संसार!!

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