कविता और दिल September 10, 2006
Posted by राही in मेरी कवितायें.trackback
दो अबुझ पहेलियाँ
कविता और दिल
बसाती अपनी बस्ती
आपस मे मिल
दुनिया खवाब की
आंखों से चुन
प्यार के तार
आपस में बुन
बांध ली किरणें
हटा कर तम
आपस मे बतियाती
जाने क्या हरदम
दुनिया की नजर
कहती है पागल
घूरती रहती हैं
मुझको हर पल
राह पर अपने
चला मै दीवाना
मगन धुन अपने
दुनिया से अनजाना
मिल जायेगी खुशी
फूल जायेंगे खिल
मुझे प्यारे अपने
कविता और दिल !!
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